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21वीं सदी के आखिर तक गायब हो जायेगा हिमालय !!!

असल में ग्लोबल वार्मिंग के कारण जिस तेजी से मौसम का मिजाज बदल रहा है, उसी तेजी से हिम रेखा भी पीछे की ओर खिसकती जा रही है। इससे जैवविविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। हिम रेखा के पीछे खिसकने से टिंबर लाइन यानी जहां तक पेड़ होते थे और हिम रेखा यानी जहां तक स्थाई तौर पर बर्फ जमी रहती थी, के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है। हिम रेखा पीछे खिसकने से खाली हुई जमीन पर वनस्पतियां उगती जा रही हैं। ये वनस्पतियां, पेड़ और झाड़ियां जिस तेजी से ऊपर की ओर बढ़ती जाएंगीं, उतनी ही तेजी से ग्लेशियरों के लिए खतरा बढ़ता चला जाएगा। नेपाल स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटिग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट ने अनुमान व्यक्त किया है कि आने वाले 33 सालों यानी 2050 तक ऐसे समूचे हिमनद पिघल जाएंगे।

हिमालय भू-विज्ञान संस्थान का मानना है कि यह ग्लोबल वार्मिंग का ही नतीजा है कि हिमालयी क्षेत्र में जहां पहले बारह महीने बर्फ गिरती थी, अब वहां बर्फ गिरने के महीनों में कमी आई है। वहां बारिश भी होने लगी है। तात्पर्य यह कि अब इस क्षेत्र में बारिश होने वाला इलाका 4000 से 4500 मीटर तक बढ़ गया है। इससे हिमालय में एक नया बारिश वाला इलाका विकसित हुआ है। तापमान में बढ़ोतरी से उपजी गर्म हवाएं जैवविविधता के लिए गंभीर खतरा बन रही हैं।

जहां तक हिमालयी क्षेत्र का सवाल है तो इस सच्चाई से इन्कार नहीं किया जा सकता कि माउंट एवरेस्ट तक ग्लोबल वार्मिग के चलते पिछले पचास सालों से लगातार गर्म हो रहा है। जिससे दुनिया की 8848 मीटर ऊंची चोटी के आसपास के हिमखंड दिन-ब-दिन पिघलते जा रहे हैं। इसरो की मानें तो हिमालय पर्वत श्रृंखला में कुल 9600 ग्लेशियर हैं। इनमें से 75 फीसद के पिघलने की गति जारी है। इनमें से ज्यादातर तो झील और झरने के रूप में तब्दील हो चुके हैं। चिंता की बात यह है कि यदि इस पर अंकुश नहीं लगा तो आने वाले समय में हिमालय की यह पर्वत श्रृंखला पूरी तरह बर्फ विहीन हो जाएगी।

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